गिद्ध संरक्षण का लिया संकल्प, बच्चों ने जाना पर्यावरण में इनका महत्व

लखनऊ। नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान में शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मनाया गया। इस अवसर पर सारस प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यक्रम में समाजसेवी एवं उद्यमी सुनैना चौधरी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। कार्यक्रम में प्राणी उद्यान के निदेशक संजय कुमार बिश्वाल, उपनिदेशक डॉ. उत्कर्ष शुक्ला, क्षेत्रीय वनाधिकारी मुकेश चंद्र कंडपाल समेत अधिकारी-कर्मचारी और विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि ने प्राणी उद्यान स्थित सारस ऑडिटोरियम में गिद्धों पर आधारित पोस्टर और ड्रॉइंग प्रतियोगिता के प्रतिभागियों की कलाकृतियों का अवलोकन कर की। इसके बाद निदेशक संजय कुमार बिश्वाल ने अतिथियों का स्वागत किया।
निदेशक ने कहा कि गिद्ध पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले करीब 30 वर्षों में गिद्धों की संख्या में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफिनाक जैसी दवाओं को भी गिद्धों की संख्या में गिरावट का एक प्रमुख कारण बताया गया।

गिद्धों को बचाने के लिए जागरूकता जरूरी
मुख्य अतिथि सुनैना चौधरी ने कहा कि गिद्धों को लंबे समय से शुभ नहीं माना जाता, जबकि प्रकृति के संतुलन में इनकी अहम भूमिका है। गिद्ध मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मदद करते हैं और प्रदूषण फैलने से रोकते हैं। उन्होंने बच्चों से अपील की कि वे घर जाकर अपने माता-पिता के साथ गिद्धों की उपयोगिता के बारे में जानकारी साझा करें और इनके संरक्षण में योगदान दें।
शिक्षक दिवस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों के पहले गुरु होते हैं और उसके बाद शिक्षक। इसलिए हमें अपने गुरुजनों का हमेशा सम्मान करना चाहिए।
रामायण में भी मिलता है गिद्धों का उल्लेख
प्राणी उद्यान के बायोलॉजिस्ट डॉ. प्रशांत त्रिपाठी और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर प्रखर कृष्ण ने गिद्धों के संबंध में छात्र-छात्राओं और अतिथियों को महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रामायण में संपाती और जटायु जैसे गिद्धों के योगदान का उल्लेख मिलता है। जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
उन्होंने बताया कि भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं। गिद्ध अत्यंत प्रभावी मृतभक्षी (scavengers) हैं, लेकिन इनका प्रजनन धीमी गति से होता है। यही वजह है कि इनकी संख्या बढ़ने में काफी समय लगता है।

गिद्ध घटे तो बढ़ सकता है बीमारी फैलने का खतरा
विशेषज्ञों ने बताया कि गिद्ध मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर देते हैं। इससे रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी बीमारियों के फैलने की आशंका कम होती है। यदि गिद्धों की संख्या लगातार घटती रही तो मृत पशुओं के शव लंबे समय तक पड़े रहने से संक्रमण और बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए समय रहते गिद्ध संरक्षण को प्राथमिकता देना जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान गिद्धों पर आधारित पोस्टर और ड्रॉइंग प्रतियोगिता में विभिन्न विद्यालयों के 100 से अधिक बच्चों ने प्रतिभाग किया। विजेता प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र और पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृति चिह्न प्रदान किए गए। उपनिदेशक डॉ. उत्कर्ष शुक्ला ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।



