महापौर बोलीं, आदेश दिए… मगर अफसरों ने फिर उड़ाया नियमों का मज़ाक
नगर निगम मुख्यालय में समीक्षा बैठक, निर्देशों की बौछार —ज़मीन पर असर नदारद

महापौर की भी अब कोई नही सुनता।
लखनऊ: नगर निगम मुख्यालय में मंगलवार को महापौर सुषमा खर्कवाल की अध्यक्षता में नगर निगम व जल निगम के अधिकारियों के साथ एक और समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में कार्यकारिणी उपाध्यक्ष, नगर आयुक्त, पार्षद, जोनल अधिकारी एवं विभागाध्यक्ष मौजूद रहे, लेकिन बैठक का निचोड़ वही पुराना रहा।
निर्देश बहुत, पालन शून्य।
जल निगम और सीवर कार्यों पर फिर दोहराए गए पुराने निर्देश
बैठक में जल निगम, सीवर, पेयजल, सड़क खुदाई और अवैध कब्जों पर विस्तार से चर्चा हुई। माननीय महापौर ने जल निगम द्वारा किए जा रहे कार्यों पर नाराज़गी जताते हुए एक बार फिर समन्वय, पारदर्शिता और जवाबदेही के निर्देश दिए।
हालांकि, ये वही निर्देश हैं जो पूर्व बैठकों में भी कई बार दिए जा चुके हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर आज तक उनके ठोस परिणाम नहीं दिखे।
सड़कों की खुदाई, चैंबरों की भरमार।
नियम सिर्फ़ किताबों में
महापौर जी ने पतली गलियों में नियमों के विपरीत बनाए गए सीवर चैंबरों पर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दो–तीन घरों के बीच एक चैंबर होना चाहिए, लेकिन शहर के कई इलाकों—जोन-5, इंदिरा नगर और जानकीपुरम—में हर घर के सामने चैंबर बना दिए गए, जिससे आवागमन और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही है।
इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा अब तक कोई जवाबदेही तय नहीं की गई।
24 घंटे में शिकायत निस्तारण के निर्देश,
हकीकत में हफ्तों इंतज़ार
जलकल से जुड़ी शिकायतों के 24 घंटे में निस्तारण के निर्देश भी नए नहीं हैं। पार्षदों ने खुले तौर पर बताया कि सीवर चोक, टूटे ढक्कन और गंदे पानी की शिकायतें कई–कई दिनों तक लटकी रहती हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
सदन के सवाल, फाइलों में दबे जवाब
27 जनवरी को हुई सदन की बैठक में पूछे गए 36 लिखित और 46 मौखिक सवालों की समीक्षा भी की गई। महापौर ने उत्तर लिखित रूप में प्रस्तुत करने को कहा, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से अधिकांश सवालों के जवाब पहले भी टाले जाते रहे हैं।
अतिक्रमण पर सख्ती सिर्फ़ बयान तक सीमित
महापौर ने अवैध अतिक्रमण हटाने और दोबारा कब्ज़ा न हो इसके लिए तारबाड़ कराने के निर्देश दिए, लेकिन शहर के लोग जानते हैं कि कई इलाकों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सिर्फ़ काग़ज़ों में होती है, ज़मीनी सख्ती नदारद रहती है।
सबसे बड़ा सवाल
जब महापौर लगातार निर्देश दे रही हैं, समीक्षा बैठकों में नाराज़गी जता रही हैं, तो
❓ अधिकारी आदेशों को क्यों नहीं मानते?
❓ लापरवाह अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
नगर निगम की ये बैठकें अब समस्या समाधान नहीं, बल्कि रस्मी औपचारिकता बनती जा रही हैं, जहाँ महापौर बोलती हैं और अधिकारी आदेशों को हवा में उड़ा देते हैं।



